पुलिस सुधार : एक अरसे की दरकार

Indian Police @pexels

पुलिस का पुलिस का नाम सुनते ही हर आम आदमी के ख़याल में सहसा रौब-दाब, भय और प्रताड़ना जैसी बातें ही आती हैं, सम्मान और कानून का राज नहीं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अवांछनीय ही कहा जायेगा। 

 इसीलिये आज से चौदह साल पहले 22 सितंबर, 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-सुधारों सबंधी ज़रूरी दिशा-निर्देश दिये थे, इस तारीख़ को अबकी बार पुलिस-सुधार दिवस के तौर पर मनाया गया। यह और बात है कि आज उसके करीब डेढ़ दशक बाद भी एक आम आदमी के लिये पुलिसिया रवैये में शायद ही किसी को कोई बदलाव महसूस हो।

इस फैसले में राज्यों को इसी के अनुरूप प्रावधान बनाने का निर्देश दिया गया था, और तब तक अदालत के निर्देश लागू रहने थे। हालांकि देश के अट्ठारह राज्य अब तक ऐसे अधिनियम बना चुके हैं, पर जानकारों के मुताबिक ये कोर्ट की मंशा के अनुरूप नहीं बल्कि सरकारों के सहूलियत के लिये कहीं अधिक मुफीद है।

 यह एक राष्ट्रीय विडम्बना ही नहीं वरन् भारतवासियों का दुर्भाग्य भी कहा जाये, कि जो पुलिस-कानून अंग्रेजी सरकार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, 1861 में, भारतीयों का दमन और शासन जमाने को लाई थी, हम आज तक उसी पर निर्भर हैं। इस बीच तमाम आयोग और समितियां गठित हुई, जिन्होंने समय-समय पर कृपया अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, पर उसे अमल में न लाया गया, चुनांचे नतीजा वही ढाक के तीन पात।

आज हमारी पुलिस नागरिक अधिकारों के संरक्षण की बजाय सत्ता-सुरक्षा के प्रति कहीं अधिक सचेत नज़र आती है।वस्तुतः, शासक वर्ग की सुगमता इसी में होती है, कदाचित् जिसके चलते ही राज्य सरकारें इस तरफ़ से आंखें मूंदे रहती हैं। और इस तरह पुलिस सत्ताधारियों का सियासी औज़ार बनकर रह जाती है। किसी दल की सरकार आने पर वह अपने विरोधी दल के लोगों की प्रताड़ना शुरू कर देती है, जिसमें पुलिस की ही मुख्य भूमिका होती है। 

 ध्यातव्य है कि इन्हीं विसंगतियों के मद्देनज़र 1977 में जनता सरकार ने श्री धर्मवीर की अध्यक्षता में पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु एक आयोग का गठन किया था। ताकि वह जनता की शोषक नहीं बल्कि सेवक की भूमिका में दिखे। पर दशकों बीत जाने के बावजूद इस आयोग की महत्वपूर्ण रिपोर्ट अभी तक धूल फांक रही है।

इससे हमारे राजनेताओं की तत्संबंधी इच्छा-शक्ति और नीयत भी कठघरे में खड़ी होती है। इसी तरह,  2006 में ही, जानेमाने कानूनविद् सोली सोराबजी की अध्यक्षता में गठित समिति की पुलिस-सुधार संबंधी सिफ़ारिशों का भी कुछ असर न हुआ। हमें समझना होगा कि एक लोकतंत्र के रूप में प्रगति के लिये हमें अपनी आंतरिक सुरक्षा संस्थाओं को जनोन्मुख बनाना ही होगा। 

 यह भी किसी से छिपा नहीं है, कि बेजा पुलिस कार्रवाई का शिकार अक्सर दबे-कुचले हाशिये पर रहने वाले ही होते हैं, वहीं अच्छी आर्थिक व राजनैतिक हैसियत वालों से इससे भिन्न व्यवहार किया जाता है। आम आदमियों के लिये गालियां तो जैसे पुलिस वालों का तकिया-कलाम हो।

यहां तक कि रिपोर्ट दर्ज कराने में भी साधारण लोगों को काफ़ी मशक्कक्त करनी पड़ जाती है। नागरिक-सुरक्षा और मानवाधिकारों को लेकर आये दिन आंदोलन होते हैं, बावजूद इसके स्थिति में कोई सुधार नज़र नहीं आता।

 किसी सामान्य आरोपित व्यक्ति से ज़वाब तलब करने और जानकारी पाने को पुलिस के हाथों सबसे बड़ा हथियार है ‘थर्ड-डिग्री।’ यानी असह्य शारीरिक प्रताड़ना देकर जुर्म कुबूल करवाना। इसके शिकार भी अमूमन कम हैसियत वाले बनते हैं। हिरासत में हर साल होने वाली सैकड़ों मतों में शायद ही किसी बड़े आदमी का नाम सुनाई देता है।

इन मौतों के लिये तकनीकी रूप से सरकार ही जिम्मेदार होती है। यह सब कानून के साथ ही मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। पर शायद ही पुलिस के जवानों को प्रशिक्षण के दौरान मानवाधिकार की सम्यक् जानकारी मिलती है। 

 पुलिस-सुधारों के संबंध में विचार करते हुये हमें भूलना नहीं चाहिये कि पुलिस मूलतः नागरिकों और उनके वाजिब हकों के संरक्षण हेतु होती है, उन पर केवल दमनात्मक कार्रवाई करने को नहीं। इसलिये एक स्वस्थ लोकतंत्र इस संस्था को जनोन्मुख होना ही होगा। पर यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि आखिर अपराधियों से फिर कैसा सुलूक किया जाए!

पर इसके लिये मजिस्ट्रेट के अधिकार और व्यापक बनाने होंगे। ऐसे ही यदि पुलिस अधिकारियों की ट्रांसफ़र/पोस्टिंग के लिये अगर कुछ संस्थागत पारदर्शी प्रावधान बनें तो उन पर नेताओं का दबाव कम होगा। दूसरी तरफ़ पुलिसवालों को खुद अपना आत्मावलोकन करना चाहिये, ताकि वे अपनी आंतरिक व्यवस्था दुरुस्त कर सकें, और अपने लिये आचार संहिता विकसित कर सकें। 

  ज़ाहिर है कि पुलिस-सुधार के लिये एक व्यापक अभियान चलाने की ज़रूरत है, जिसके बिना न तो पुलिस की छवि में कोई सुधार आ सकता है, और न ही नागरिक अधिकारों का संरक्षण संभव है। इसीलिये हमारे नीति-नियंताओं का यह अहम् उत्तरदायित्व बनता है कि पुलिस संबंधी कानूनों/प्रावधानों की गहन समीक्षा कर उसे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप ढाला जाये। 

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