टीवी चैनलों पर बहस का गिरता स्तर

Television @pexels

 शीर्ष अदालत ने  सुदर्शन टीवी के एक  आपत्तिजनक कार्यक्रम पर रोक लगाते हुये समचार-चैनलों पर आजकल चलने वाली बहसों के गिरते स्तर पर चिंता प्रकट की है। उक्त चैनल का यह ‘शो’ एक समुदाय विशेष को लक्षित है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारों व कर्तव्यों का सशर्त पालन ही हमारे सह-अस्तित्व का आधार है। इसलिये किसी मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ‘हेट-स्पीच’ यानी घृणास्पद भाषण की छूट नहीं मिल सकती।

 इसमें दो राय नहीं कि आजकल टीवी चैनलों पर जिस तरह के शोर-मचाऊ वाद-विवाद दिखाये जाते हैं, और उनमें प्रतिभागी अर्थात् पैनलिस्ट जिस तरह से आपा खोकर आपस में भिड़ते हैं, वह किसी गली-नुक्कड़ पर तथाकथित अल्पज्ञ जनों में होने वाली नोकझोंक से भी गई-गुजरी दिखती है। कभी-कभार तो लगता है कि अब हाथापाई ही हो जायेगी।

यह दर्शकों में उत्तेजना बनाये रखते हुये उन्हें ‘शो’ से चिपकाये रखने, और इस तरह प्रोग्राम की टीआरपी बढ़ाने में भले उपयोगी हो, पर लोगों पर पड़ने वाले इसके असर का आकलन करना भी अपरिहार्य है। देखें तो अक्सर ये बहसें हमें किसी संतोषजनक नतीज़े तक नहीं पहुंचातीं, बल्कि कहीं न कहीं हमारी पूर्वपोषित धारणाओं को ही धार देते हुये हमें और भी उलझा जाती हैं।

इतना ही नहीं कुछ एंकर भी बहस के प्रतिभागियों से उलझ पड़ते हैं। इस दौरान इनमें एक पक्षपात साफ़ झलक जाता है। जबकि इनसे बहस को निष्पक्षता और तटस्थता के साथ संचालित करने की उम्मीद की जाती है; ताकि उस विचार मंथन से जो नवनीत सत्य प्रकाशित हो जनता उससे पारदर्शी तरीके से अवगत हो सके। हमें भूलना नहीं चाहिये कि किसी भी वाद-विवाद की सार्थकता सत्य तक पहुंचने में है, दूसरे को येन-केन नीचा दिखाने में नहीं।

पर दुर्भाग्यवश आजकल कुछ ऐसा ही चल रहा है। अपनी बात ऊपर रखने को लोगबाग किसी भी हद तक जाने को तत्पर दीखते हैं। और हमारे कुछेक मीडिया प्रतिष्ठान ऊपरी स्तर पर इस भद्दे चलन की अगुवाई करते दिखते हैं। 

 कहना न होगा कि मीडिया संस्थान हमारा वैचारिक नेतृत्व करते हैं। ये हमारे लोकमत को दिशा देने की क्षमता रखते हैं। विशेषतः टीवी जैसा सुगम और सर्वसुलभ माध्यम लोगों पर अपना ख़ास असर रखता है।

शिक्षित-अशिक्षित-अर्द्धशिक्षित हर वर्ग में इसकी बराबर पैठ है। जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने तत्संबंधी अपनी टिप्पणी में कहा– कि टीवी का एक अलग ‘मनोरंजन मूल्य’ है।

 इसीलिये विविधतापूर्ण भारतीय संस्कृति में इन्हें अपने महत्वपूर्ण और संवेदनशील उत्तरदायित्वों के प्रति सदैव सचेत बने रहना होगा। पत्रकारों का स्वविवेक से ऐसा आत्मनियमन लाना कहीं गरिमापूर्ण होता है।

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