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गधा ही मूर्ख क्यों ?

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किसी  गांव  में  एक कुम्हार  रहता था । उसके  पास  एक गधा था । वह  गधे से दिनभर  मेहनत कराता था और  उसे बात-बात  पर  डांटता रहता था । साथ  ही  अगर गधे से कोई  जरा -सी भी गलती  हो  जाती थी तो कुम्हार  उसे लाख बार  मूर्ख  कह कर ही मन में संतोष  पाता  था ।


गधे को न मेहनत से  बुरा  लगता था और न ही कुम्हार  की डांट-फटकार या पिटाई से ही वह दुःखी  होता था । वह तो इस बात  से दुखी था कि कुम्हार  उसे मूर्ख क्यों  कहता है ?  क्या वह गधा  है इसलिए  मूर्ख  है?  और सब गधों को ही मूर्ख  क्यों  कहते हैं या मूर्खों  को ही गधा क्यों  बोलते हैं ?” सबसे  ज्यादा  चिंता  तो गधे को  इस बात की थी कि लोग मूर्ख  को गधा  ही कहकर  क्यों  बुलाते हैं ।किसी  अन्य  जानवर का नाम  लेकर  क्यों  नहीं  बुलाते?


एक दिन  जब गधा  जंगल  में  चरने गया तो उसकी  मुलाकात  एक महात्मा  से हुई  । गधे ने महात्मा  को प्रणाम  किया  और  पूछा -” महात्मा  जी,  सब लोग हम गधों  को  मूर्ख क्यों  बोलते हैं?  और  मूर्खों  को गधा  ही क्यों  कहकर  बुलाते हैं? “


“क्योंकि  तुम  समझदारी  के  काम  नहीं  करते  इसीलिए  लोग  तुम्हें  मूर्ख  कहते हैं।  समझदारी  के  काम  करोगे  तो लोग  तुम्हें  मूर्ख  कहना  छोड़  देंगे और  फिर  मूर्खों को  भी गधा  नहीं  बोला  जाएगा  ।”महात्मा  ने  गधे को समझाया ।


महात्मा  जी  की  बात  गधे को अच्छी  लगी  और उसने मन -ही-मन निश्चय किया कि  आज इसी  पल से मैं अपने  हर काम  में  अपनी  समझदारी  का परिचय  दूंगा और फिर देखूंगा कि कोई  गधे को  कैसे  मूर्ख  बोलता है !


अगले  दिन सुबह -सुबह  कुम्हार  ने गधे की पीठ  पर मिट्टी के बरतन  लादे और बोला  -” थोड़ा  जल्दी-जल्दी  चलना, दोपहर  से पहले  बरतनों को शहर  पहुंचाना है ।”


गधे ने मन-ही-मन अपनी  समझदारी का परिचय  देने  का निर्णय  किया और वह तेज कदम रखते हुए  शहर  की तरफ चल पड़ा । कुम्हार  उसके पीछे-पीछे  चलने  लगा  । गधे के उत्साह और  उसकी  तेज़  चाल को देखकर  कुम्हार  इतना खुश  हुआ कि उसने गधे की बड़ाई  करते हुए  कुछ  शब्द  बोल  दिए।


जैसे  ही गधे ने वे शब्द  सुने उसमें  गजब का जोश  पैदा  हो गया और  वह लगभग  दौड़ने  लगा । कुम्हार  ने समझाया  भी मगर  उसकी  एक बात  न सुनी । उसने दौड़ते  समय  यह भी  न सोचा कि  उसकी पीठ पर मिट्टी  के  बरतन लदे हैं और  वे गिर  गये तो  क्या  होगा । वह  तो बस अंधाधुंध  दौड़ने  लगा  और  कुछ  दूर  जाने  पर ऐसी  ठोकर  लगी कि जमीन  पर  औंधे  मुंह  जा गिरा । उसकी पीठ  पर लदे  मिट्टी  के  सारे बरतन टूट-फूट गए।


कुम्हार  को गधे पर बहुत  क्रोध आया और  वह उसे  डांटते  हुए  बोला  -” मूर्ख  बिना सोचे- समझे भाग  लिया । भागने  से पहले  एक  बार नहीं  सोचा  कि  पीठ पर मिट्टी के बरतन लदे हैं ,अगर गिर  गए तो टूट  जाएंगे ।”कुम्हार  की बात  सुनकर  गधा  तुरंत  समझ  गया कि  लोग  उन्हें  मूर्ख  क्यों कहते हैं  और  साथ  ही मूर्खों को  गधा  ही क्यों  बोला  जाता है ।


शिक्षा: जो  किसी काम को करने  से पहले  उसके  परिणाम के बारे  में  नहीं  सोचता  वही मूर्ख  है।

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