देश में आय की असमानता और वेतन-आयोग

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देश में आय की असमानता और वेतन-आयोग

भारत की ज्वलंत आर्थिक समस्याओं के मूल में गरीबी नहीं आय की असमानता है, आज अधिकांश अर्थशास्त्री इस बात से सहमत होंगे। देखा जाय तो इसके लिये पूंजीवादी सोच के अलावा जो व्यवस्था सर्वाधिक जिम्मेदार है, वह है — वेतन आयोग। जो हर दस साल पर बढ़ती महंगाई के हिसाब से लाखों सरकारी कर्मियों का वेतन उसी अनुपात में बढ़ा देता है। 


 इस तरह देखें तो इन सरकारी कर्मचारीगणों पर महंगाई का असर नगण्य रहता है। जबकि इसके सापेक्ष किसान, मजदूर, बेरोजगार और असंगठित क्षेत्र के कर्मियों की आय जस की रह जाती है, या उस हिसाब से उसमें बहुत मामूली वृद्धि ही होती है।


 इसी क्रम में आज सरकारी कर्मचारियों का वेतन इतना अधिक बढ़ चुका है, कि उसके ज़िक्र की ज़ुरूरत नहीं। इसका अंदाज़ा लगाने के लिये सरकारी नौकरियों पर होने वाली मारामारी, और अंदरखाने चलने वाली घूस की रकम पर एक निगाह डाली जा सकती है। फिर, यदि हो तो, ऊपर की कमाई अलग से। समय-समय पर तमाम बोनस और फंड साथ में। हालांकि इतने पर भी उनके कार्य-निष्पादन की गुणवत्ता, अर्थात् तनख़्वाह के रूप में उन पर होने वाले ‘जन-धन निवेश’ के सापेक्ष उनकी उत्पादकता, न के बराबर होती है। इसके लिये हम शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे किसी भी क्षेत्र में लगे सरकारी कर्मियों की कार्य-दक्षता देख सकते हैं। साथ ही उसके समानांतर निजी क्षेत्र की उन्हीं सेवाओं की तुलना कर सकते हैं। जहां यकीनन बहुत फ़र्क है।


 इसे राजस्व अथवा राष्ट्रीय-आय के लिहाज़ से देखें तो उसमें योगदान करने की अपेक्षा सरकारी कर्मचारियों के लिये प्राप्तियों का अनुपात बाकी सबसे बहुत अधिक है। ज़ाहिर है इससे देश की प्रगति में एक खोखलापन पैदा होता है। यह तथ्य देश में आय की असमानता बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। कदाचित् इसे देखते हुये ही अब आने वाले आठवें वेतन-आयोग की सिफ़ारिशों में, कर्मचारियों के कार्य-निष्पादन स्तर को भी उनकी वेतन-वृद्धि का आधार बनाये जाने की योजना है। जो कि एक स्वागतयोग्य पहल है। 


 वस्तुतः सरकारी अमले में पारदर्शी उत्तरदायित्व व निगरानी की व्यवस्था और तत्संबंधी कानून इतने लचर हैं, कि कर्मचारियों में नौकरी को लेकर एक निश्चिंतता बनी रहती है। और वे अपने उत्तरदायित्वों को लेकर उतने सचेत या संवेदनशील नहीं रह पाते जैसे कि निजी संस्थानों के कर्मी। इसलिये भी लोगों में सरकारी नौकरियों का इतना आकर्षण है। करीब-करीब हर विभाग में तमाम भ्रष्टाचार हेतु साठगांठ की ऐसी परंपरागत व्यवस्था विकसित हो जाती है, जिसे तोड़ना भी फिर आसान नहीं रह जाता। ऐसे में न चाहते हुये भी कोई नौकरी करते हुये उसी माहौल में रम जाने को बाध्य सा हो जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि सरकारी अमले में काबिलियत की कोई कमी है; और इसके लिये समय-समय पर सामने आने वाली तमाम मिसालें मौज़ूद हैं। पर चंद मिसालों की बिनाह पर सबके लिये नियम कैसे निर्मित किये जा सकते हैं!


  सो, सरकार को हर दस साल पर वेतन-आयोग गठन की परंपरा को अब दरकिनार कर देना चाहिये। या फिर इस तरह सरकारी अमले हेतु नियत किये जाने वाले वेतनमान का आधार महंगाई की बजाय ‘सकल घरेलू उत्पादन’ होना चाहिये। ताकि देश की संतुलित आर्थिक प्रगति के मद्देनज़र जनसामान्य की औसत आय से उसका तालमेल बना रहे। आखिर सरकारी कर्मियों की तनख़्वाह अंततः लोगों के पैसों से ही निकलती है; जो वे कर आदि माध्यमों से सरकार को देते हैं। सातवें वेतन-आयोग की सिफ़ारिशें २०१६ से लागू हैं, और अब आठवें वेतन-आयोग के गठन की सुगबुगाहट शुरू है। पर सरकारी कर्मचारियों का वेतन-निर्धारण देश की सबसे बड़ी आर्थिक समस्या — आय की असमानता को बढ़ावा देने का एक प्रमुख कारक नहीं बनना चाहिये..

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