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शादी -विवाह एक धार्मिक रुढी और परम्परा का बंधन

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शादी -विवाह एक धार्मिक रुढी और परम्परा का बंधन

क्या है शादी ?

विवाह, जिसे शादी भी कहा जाता है, दो लोगों के बीच एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त मिलन है ,दो व्यक्तियों का बंधन और संस्कृति, सांस्कृतिक परंपरा का मिलन, जो उन लोगों के बीच, साथ ही उनके और किसी भी परिणामी जैविक या दत्तक बच्चों तथा समधियों के बीच अधिकारों और दायित्वों को स्थापित करता है।

शादी एक समाज व्यवस्था और धर्म व्यवस्था

विवाह मानव समाज की अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रथा या संस्था है। यह समाज का निर्माण करने वाली सबसे छोटी इकाई परिवार का मूल है। इसे मानव जाति के सातत्य को बनाए रखने का प्रधान साधन माना जाता है। इस शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो अर्थों में होता है। इसका पहला अर्थ वह क्रिया, संस्कार, विधि या पद्धति है जिससे पति-पत्नी के स्थायी संबंध का निर्माण होता है।

प्राचीन एवं मध्यकाल के धर्मशास्त्री तथा वर्तमान युग के समाजशास्त्र एवं समाज द्वारा स्वीकार की गई ‘परिवार की स्थापना करने वाली किसी भी पद्धति’ को विवाह मानते हैं। मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि के शब्दों में ‘विवाह एक निश्चित पद्धति से किया जाने वाला, अनेक विधियों से संपन्न होने वाला तथा कन्या को पत्नी बनाने वाला संस्कार है।’ रघुनंदन के मता नुसार ‘उस विधि को विवाह कहते हैं जिससे कोई स्त्री (किसी की) पत्नी बनती है।’

पारिवारिक धर्म अधिकार

वैस्टरमार्कने इसे एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रीयों के साथ ऐसा संबंध बताया है, जो इस संबंध को करने वाले दोनों पक्षोंको तथा उनकी संतान को कुछ अधिकार एवं कर्तव्य प्रदान करता है। विवाह का दूसरा अर्थसमाज में प्रचलित एवं स्वीकृत विधियों द्वारा स्थापित किया जाने वाला दांपत्य संबंध और पारिवारिक जीवन भी होता है। इस संबंध से पति पत्नीको अनेक प्रकार के अधिकार और कर्तव्य प्राप्तहोते हैं। इससे जहाँ एक ओर समाज पति पत्नीको कामसुख के उपभोग का अधिकार देता है, वहाँ दूसरी ओर पति पत्नीतथा संतान के पालन एवं भरणपोषण के लिए बाध्य करता है।

    संस्कृत में ‘पति’ का शब्दार्थ है पालन करने वाला तथा ‘भार्या’ का अर्थ है भरणपोषण की जाने योग्य नारी। पति के संतान और बच्चों पर कुछ अधिकार माने जाते हैं। विवाह समाज में संतानों की स्थिति का निर्धारण करता है। संपत्ति का उत्तराधिकार अधिकांश समाजों में वैध विवाहों से उत्पन्न संतान को ही दिया जाता है।

 वैवाहिक मुख्य संस्कार

हिन्दू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह दो शब्दों से मिलकर बना हैवि + वाह। अत: इसका शाब्दिक अर्थ है– “विशेष रूप से (उत्तर दायित्व का) वहन करना पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से ‘हिन्दू विवाह’ के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नीके बीच एक प्रकार का करार होता है, जिसे विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है। परंतु हिन्दू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षीमान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिन्दू विवाह में पति और पत्नीके बीच शारीरिक सम्बन्ध से अधिक आत्मिक सम्बन्ध होता है और इस सम्बन्ध को अत्यंत पवित्र माना गया है।

   जब शादियों की बात आती है, तो हर कोई खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखाना चाहता है और अपने सजे सवरे रूप को पेश करता है, और इसमें उज्ज्वल और आकर्षक सोने और चांदी के आभूषणों से ज्यादा आकर्षक कुछ भी नहीं है। जब आप लहंगा, शरारा और कई तरह के पहनावा चुन सकती हैं, तो साड़ी ऐसी चीज है जिस में आप कभी भी कमी नहीं समझ सकती हैं। कभी तो लगता है जैसे हम केवल वही नहीं हैं जो आप सोचते है। हिन्दू शादी की विशेषता नए और उंचे कपडे, आभूषण इसके साथ और बड़ी संख्या में बाराती, शहनाई , स्वादिष्ट भोजन यह कुछ खास बाते है जो हिन्दू विवाह संस्कृति की उत्कृष्ट मिसाल है।

संस्कारो का उद्देश्य

श्रुति का वचन है- दो शरीर, दो मन और बुद्धि, दो हृदय, दो प्राण व दो आत्माओं का समन्वय कर के अगाध प्रेम के व्रत को पालन करने वाले दंपति उमा-महेश्वर के प्रेमादर्शको धारण करते हैं, यही विवाह का स्वरूप है। हिन्दू संस्कृति में विवाह कभी ना टूटने वाला एक परम पवित्र धार्मिक संस्कार है, यज्ञ है। विवाह में दो व्यक्ति (वर-वधू) अपने अलग अस्तित्वों को समाप्त कर, एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं, वैसेही, एक-दूसरे को अपनी भावनाओं एवं योग्यताओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे दो पहियों की तरह प्रगति पथ पर बढते हैं। यानी विवाह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है, जिसका उद्देश्य मात्र इंद्रिय-सुखभोग नही, बल्कि पुत्रोत्पादन या संतानोत्पादन कर एक परिवार की नींव डालना है।

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